Friday, 12 August 2011

बर्दाश्तगी की  हदों ने हमें हम से चुरा लिया
दूर रहकर जलाने वालों ने किया तो क्या बुरा किया

हम तो मुहब्बत में इस कदर लुट गए
जान ए वफ़ा की यादों ने अक्सर रुला दिया

हम तो कहते रहे ज़ालिम इस दिल से
की यादें उनकी भुलाया कर ....
कम्बख्त इस दिल ने हमारे यह ख़याल ही भुला दिया

पहले कभी हुआ करते थे हम आशिक ए इजहार
तेरी हसीं बेवफाई ने हमें शायर बना दिया

माना के हम ही करते रहे इकरार ए मोहब्बत
क्या तूने कभी यादों में भी मोहब्बत का ज़िक्र किया .......